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हिंदुओं ने दिया था कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन का साथ, आज शिया मुस्लिम क्यों गए कृतघ्न?

सोमवार, 25 सितम्बर 2017


बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस वर्ष मोहर्रम के दिन 1 अक्तूबर 2017 को हिंदुओं के त्योहार दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर प्रतिबंध लगा दिया था जो माननीय कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा हटा दिया गया है और उस दिन सुरक्षा के उचित प्रबंध करने के लिए निर्देश दिये हैं। समाचार रिपोर्ट्स के अनुसार ममता बनर्जी ने हिंदुओं पर इस प्रकार के प्रतिबंध लगाने के लिए सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने का तर्क दिया और मेरा मानना है कि उन्होने इस कुतर्क का सहारा लिया। उन्होने ये भी कहा कि सभी को आपस में समन्वय बनाना चाहिए और सांप्रदायिक समस्याएँ बड़ाने वालों के उकसाने में नहीं आना चाहिये। अब प्रश्न ये है कि क्या हिंदुओं पर दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाना क्या समन्वय का उदाहरण है और क्या मात्र हिंदुओं के धार्मिक कार्यक्रमों पर एक दिन रोक लगाना सांप्रदायिक सौहार्द बड़ाने का कार्य है?। अच्छा तो ये होता कि वो दोनों समुदायों को अपने अपने कार्यक्रम धार्मिक अनुष्ठानों के अनुसार करने देती और उन्हे एक दूसरे के कार्यक्रमों में सहयोग करने को कहती। शिया मुस्लिम इमाम हुसैन के बलिदान का दुख प्रकट करते हुए ताज़िया निकालते और उसी नगर में हिन्दू विभिन्न मार्ग का प्रयोग कर माँ दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन करते। यही भारत के संविधान का सही सम्मान भी होता।

किन्तु मैं यहाँ ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण नीतियों पर आपत्ति करने की बात नहीं करना चाहता। मेरा इस लेख के माध्यम से सम्पूर्ण शिया मुस्लिम समाज से एक प्रश्न है कि ममता बनर्जी द्वारा हिंदुओं के दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर एक दिन के प्रतिबंध लगाने के बाद उनका क्या कर्तव्य था और है?हज़रत इमाम हुसैन का बलिदान शिया मुस्लिमों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है जब 10 अक्तूबर 680 एडी के दिन कर्बला के युद्ध में खलीफा यजीद प्रथम की सेनाओं ने इमाम हुसैन और उनके साथ कई अन्यों की हत्या कर दी थी। इमाम हुसैन और उनके साथ के लोग संख्या में कम होते हुए भी यजीद की हजारों की सेना के सामने डटे रहे और शहीद हो गए। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि कर्बला के इसी युद्ध में निस्वार्थ रूप से 10 हिन्दू दत्त ब्राह्मणों ने भी इमाम हुसैन की ओर से खलीफा यजीद की सेना से युद्ध किया था। उन हिन्दू दत्त ब्राह्मणों के नेता का नाम राहिब दत्त था और राहिब दत्त के सातों बेटे और अन्य दो दत्त ब्राह्मण इसी कर्बला के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद राहिब दत्त हुसैनी ब्राह्मण कहलाए और उनके वंशज आज भी पाकिस्तान, भारत के महाराष्ट्र, राजस्थान, आगरा, दिल्ली, बिहार आदि राज्यों में रहते हैं। वे भी अपने को हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं और मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन और अपने पूर्वजों की याद में ताज़िया निकालते हैं। इस विषय पर अधिकतम जानकारी के लिए मेरा हुसैनी ब्राह्मणों पर लिखा ये लेख पड़ें।




हिन्दू सदा युद्ध में जाने से पहले शक्ति अर्थात माँ दुर्गा की उपासना करते हैं और उनसे शत्रुओं के संहार और विजय की कामना करते हैं। निस्संदेह स्वर्गीय राहिब दत्त, उनके सातों पुत्र और अन्य साथी माँ दुर्गा की उपासना करके ही कर्बला के युद्ध में भाग लिए होंगे। और उसके बाद अत्यंत कम संख्या में होते हुए भी निर्भीकता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध में उन 10 हिंदुओं में से मात्र राहिब दत्त जीवित बचे थे जो बाद में लाहौर वापिस आ गए थे।


आज जब कर्बला के युद्ध में इमाम हुसैन की शहादत की याद में मोहर्रम पर दुख मनाया जाता है तो संयोगवश उसी दिन दुर्गा पूजा विसर्जन भी हो तो क्या हिंदुओं को दुर्गा मूर्ति विसर्जन से रोक दिया जाना चाहिए? ये वही हिंदुओं के वंशज है जिन्होने कर्बला के ऐतिहासिक युद्ध में इमाम हुसैन के लिए बिना किसी स्वार्थ के युद्ध किया था। अर्थात जिस कर्बला के युद्ध में शहीद हुए इमाम हुसैन की याद में शिया मुस्लिम दुख मनाते हैं उसी युद्ध में हिंदुओं द्वारा शियाओं का साथ देने के बाद आज हिंदुओं को ही अपने धार्मिक कार्यक्रम करने से रोका जा रहा है। और वो भी उस आदि शक्ति माँ दुर्गा का धार्मिक कार्यक्रम जिनकी पूजा करके हिन्दू इमाम हुसैन के लिए युद्ध में भाग लिए थे और वीरगति को भी प्राप्त हुए थे। ऐसे में शिया मुस्लिमों का क्या कर्तव्य है? क्या उन्हे ममता बनर्जी के निर्णय पर खुश होना चाहिए अथवा आज आज सरकार द्वारा हिंदुओं की प्रताना पर हिंदुओं के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। क्या ममता बनर्जी के निर्णय के लिए शिया मुस्लिम उत्तरदायी नहीं हैं क्योंकि उनके ही धार्मिक कार्यक्रम के कारण हिंदुओं पर दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर प्रतिबंध लगाया गया था। शिया मुस्लिमों का इस पर मौन एक प्रकार से मौन स्वीकृति ही है।


आज ये सब देखकर स्वर्गीय राहिब दत्त, कर्बला के युद्ध में मारे गए उनके सातों बेटों और अन्य दो दत्त ब्राह्मणों की आत्मा को बहुत कष्ट पहुँच रहा होगा। और क्या हज़रत इमाम हुसैन, जो सृष्टि में जिस भी रूप में होंगे, उनकी रूह को भी दुख नहीं हो रहा होगा?


ऐसे में मैं शिया मुस्लिमों से आशा करता था कि बंगाल और देश के अन्य हिस्सों से शिया मुस्लिम खड़े होंगे और ममता बनर्जी से मांग करेंगे कि हिंदुओं को अपने धार्मिक कार्यक्रम दुर्गा मूर्ति विसर्जन को सम्मान से करने दिया जाए, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। कुछ हिन्दू अधिवक्ताओं ने न्याय की ये लड़ाई भी स्वयं लड़ी और सफलता भी पाई। माँ दुर्गा उन्हे आशीष देंगी। माँ दुर्गा सब कर सकती हैं किन्तु अपने भक्तों को देखती हैं कि कौन धर्म की रक्षा में खड़ा होता है। मैं माँ दुर्गा से प्रार्थना करता हूँ कि वो हिंदुओं और शिया मुस्लिमों भी आशीष दें और उन्हे भी जो उन्हे नहीं मानते। 

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