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वेदों में मातृभूमि की ओर कर्तव्य

उत्तिष्ठत सं नह्मध्वमुदारा केतुभिः सहः।
सर्पा इतरजना रक्षांस्यमित्रननु धावत्।
अथर्ववेद 11.10.1

हे देशभक्त वीरों, उठो तैयार हो जाओ। राष्ट्रध्वज हाथों में लो और जो आस्तीन के साँप हैं, पराए हैं, देश प्रेमी हैं, जो राक्षस हैं, उन सब शत्रुओं पर धावा बोल दो, अर्थात देश द्रोहीयों को नष्ट कर दो। उनके इरादों को विफल कर दो।

भारतीडे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे।
ता नश्चोदयत श्रिये॥
ऋगवेद 1.188.8

मैं मातृभूमि, मातृभाषा और मातृसंस्कृति इन तीनों देवियों की आराधना करता हूँ। वे सब हमें श्वर्य की ओर प्रेरित करें। अर्थात हम इन तीनों की रक्षा और उन्नति का सब प्रकार से प्रयास करें।

अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्।
अभीषास्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहिः॥
अथर्ववेद 12.1.54

मैं अपनी इस मातृभूमि पर से विरोधी शक्तियों का पराभव करने वाला हूँ, प्रशंसनीय कीर्ति वाला हूँ और सब ओर से सब शक्तियों का नाश करने वाला हूँ, अर्थात हमें अपने शत्रुओं को जो हमारी भाषा, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र को नष्ट करना चाहते हैं, उन्हे नष्ट करने का प्रत्येक संभव प्रयास करना चाहिए।

हुवे सोमं सवितारं नमोभिर्विश्वानादित्यां अहमुत्तरत्वे।
अहमग्निर्दीदायद्दीर्घमेव सजातैरिद्धोsप्रतिब्रुवदि
अथर्ववेद 3.8.3

मैं नमनपूर्वक सोम, सविता और सब आदित्यों को बुलाता हूँ कि वे मुझे ऐसे सहायता दें जिससे मैं श्रेष्ठतर योग्यता पाऊँ। परस्पर विरोध न करने वाले, स्वजातीय लोगों के द्वारा जो यह राष्ट्रीयता की अग्नि प्रदीप्त की गई है, वह हमारे लोगों में बहुत समय तक जलती रहे। अर्थात हम राष्ट्रीयता की भावना से सदा प्रेरित एवं ओत-प्रोत रहें। 

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