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सूर्यनमस्कार और इस्लाम
जानिए क्यों है मुस्लिमों को सूर्यनमस्कार से समस्या
लेखक-जितेंद्र खुराना
                                                 
प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए आग्रह किया और 177 राष्ट्रों ने अपना समर्थन करते हुए 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मानते हुए इतिहास रच दिया। किन्तु अपने ही देश भारत में एक विवाद भी खड़ा हो गया जब मुस्लिम पर्सनल लॉं बोर्ड, शीर्ष इमामों एवं मुस्लिम संगठनों ने विरोध कर दिया कि मुस्लिम योग में सूर्यननमस्कार नहीं कर सकते क्योंकि मुस्लिम सिर्फ अल्लाह की पूजा और केवल अल्लाह को ही सजदा करते हैं इसलिए सूर्यनमस्कार मुस्लिमों के इस्लाम विरोधी है।

मेरा यह लेख इसी विषय पर विस्तृत प्रकाश डालने के लिए है कि भारत वर्ष के अभिन्न अंग मुस्लिम समाज ने ये विरोध क्यों किया और सभी दीन-धर्म की भावनाओं का सम्मान रखते हुए अब इसके आगे क्या किया जा सकता है।

सूर्यनमस्कार
सूर्यनमस्कार प्रातःकाल में भोर के समय में उगते हुए सूर्य की हल्की किरणों के सामने पूर्व दिशा की ओर मुख कर किया जाता है। इसमें प्रत्येक स्थिति में साथ साथ मंत्रोचरण भी किया जाता है। सूर्यनमस्कार को इस चित्र से समझ सकते हैं।


इस्लाम में मुस्लिमों के लिए आदेश
निम्मलिखित विषयों पर मैं इस्लामी मजहबी ग्रंथ कुरआन की अनेकों आयतें पाठक की जानकारी के लिए बता सकता हूँ किन्तु उतना ही वर्णन करूंगा कि जितने से पाठक को विषय के बारे संक्षेप में सटीक जानकारी मिल जाए।

इस्लामी मजहबी ग्रंथ कुरआनमें सूर्य के विषय में अल्लाह के संदेश
मेरे विस्तृत विचारों की अपेक्षा सीधे कुरआन की कुछ आयते को जानना उचित होगा कि इस विषय पर बहुत ही स्पष्ट हैं।
1-सूरा दस-युनूस, आयत 5
वही है जिसने सूर्य को सर्वथा दीप्ति और चन्द्रमा को प्रकाश बनाया और उनके लिए मजिलें निश्चित की, ताकि तुम वर्षों की गिनती और हिसाब मालूम कर लिया करो। अल्लाह ने यह सब कुछ सोद्देश्य ही पैदा किया है। वह अपनी निशानियों को उन लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, जो जानना चाहें।
2-सूरा 14-इबराहीम, आयत 33
और सूर्य और चन्द्रमा को तुम्हारे लिए कार्यरत किया कि एक नियत विधान के अधीन निरंतर गतिशील हैं। और रात और दिन को भी तुम्हें लाभ पहुंचाने में लगा रखा है।
3-सूरा 16-अन नहल, आयत 12
और उसने तुम्हारे लिए रात और दिन को और सूर्य और चन्द्रमा को कार्यरत कर रखा है। और तारे भी उसी की आज्ञा से कार्यरत हैं-निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं।
4-सूरा 21-अल-अंबिया, आयत 33
वही है जिसने रात और दिन बनाए और सूर्य और चंद्र भी। प्रत्येक अपने अपने कक्ष में तैर रहा है।

                                                  
                                      मुस्लिम सजदा करते हुए
इस्लामी मजहबी ग्रंथ कुरआन में सिर्फ अल्लाह की पूजा के विषय में कुछ आयतें
1-सूरा 16-अन-नहल, आयत 51
अल्लाह का फरमान है :दो-दो पूज्य-प्रभु न बनाओ, वह तो बस अकेला पूज्य-प्रभु है। अतः मुझी से डरो।
2-सूरा 17-बनी इसराइल, आयत 22
अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न बनाओं अन्यथा निन्दित और असहाय होकर बैठे रह जाओगे।
3-सूरा 20-ताoहाo,
आयत 14
निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ। मेरे सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः तू मेरी बन्दगी कर और मेरी याद में नमाज़ क़ायम कर।
आयत 98
तुम्हारा पूज्य-प्रभु तो बस वही अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं है। वह अपने ज्ञान से हर चीज़ पर हावी है।

अगर अल्लाह के साथ मुस्लिम किसी ओर की पूजा करे तो इस विषय मे कुरआन की कुछ आयतें
1-सूरा 17-बनी इसराइल, आयत 39
ये तत्वदर्शिता की वे बातें हैं, जिनकी प्रकाशना तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर की हैं। और देखो, अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न घड़ना, अन्यथा जहन्नम में डाल दिये जाओगे निन्दित, ठुकराए हुए।
2-सूरा 22-अल-हज, आयत 31
इस तरह कि अल्लाह ही की ओर के होकर रहो। उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, क्योंकि जो कोई अल्लाह के साथ साझी ठहराता है तो मानो वह आकाश से गिर पड़ा। फिर चाहे उसे पक्षी उचक
ले जाएँ या वायु उसे किसी दूरवर्ती स्थान पर फेंक दे।

मुस्लिम समाज का ये मानना है कि सूर्यनमस्कार कर देने से सूर्य की पूजा हो जाएगी और इस विषय के बारे में इस्लामी मजहबी ग्रंथ कुरआन में स्पष्ट वर्णन है।
1-सूरा 27, अन-नम्ल, आयत 24
मैंने उसे और उसकी कौम को अल्लाह के इतर सूर्य को सजदा करते हुए पाया। शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए शोभायमान बना दिया है और उन्हे मार्ग से रोक दिया है-अतः वे सीधा मार्ग नहीं पा रहे हैं।
2-सूरा 41, हाo मीमo, अस-सजदा, आयत 37   
रात और दिन और सूर्य और चन्द्रमा उसकी निशानियों में से हैं। तुम न तो सूर्य को सजदा करो और न चन्द्रमा को, बल्कि अल्लाह को सजदा करो जिसने उन्हे पैदा किया, यदि तुम उसी की बन्दगी करने वाले हो।

अब यहाँ बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि मुस्लिम अल्लाह के अतिरिक्त किसी ओर की पूजा नहीं कर सकते और सूर्य के विषय में तो बिलकुल साफ़ है कि सूर्य को तो सजदा कर ही नहीं सकते। और अगर ऐसा कोई मुस्लिम करता है तो वह अल्लाह की ओर से दंड का अधिकारी बन जाता है। मेरा भी यही मानना है कि ,मुस्लिम समाज को उनकी मजहबी भावनाओं का सम्मान करते हुए इसके लिए बाध्य करना तो दूर कहना भी नहीं चाहिए कि वे सूर्यनमस्कार करें।

आप ऊपर सूर्यनमस्कार के चित्र से समझ सकते हैं कि सूर्यनमस्कार करते समय कुछ शारीरिक स्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं जो मुस्लिमो के सजदे के समान लगती हैं और मुस्लिम समाज को ऐसा लगता है वे सूर्य के सामने सजदा कर रहे हैं और इसके साथ सूर्य की पूजा हो रही है।

किन्तु एक बात ओर है जिस पर पाठकों और मुस्लिमो और उनके मजहबी गुरुओं का ध्यान मैं ले जाना चाहता हूँ। वे यह कि क्या मुस्लिम कभी सजदे के अतिरिक्त कभी ऐसी शारीरिक स्थिति में नहीं आते हैं। जब भी मुस्लिम कोई चीज़ उठाएँ, अपने घर में पलंग के नीचे कोई चीज़ ढूंदे तब भी तो शरीर की ऐसी स्थिति आ जाती है। किन्तु सच यह है कि उसे सजदा नहीं कह सकते क्योंकि वह सजदे की भावना से नहीं किया गया है। जहां तक मेरा ज्ञान है इस्लाम में तकवा का बहुत महत्व है। तकवा का अर्थ है धर्मपरायनता अर्थात आस्था। मैं मुस्लिम मजहबी गुरुओं से पूछना चाहता हूँ कि क्या सजदा बिना तकवा के माना जा सकता है। क्या वो सजदा जिसमे मुस्लिम के दिल में तकवा ना हो तो क्या वह सजदा ही है? मैं इसका उत्तर न देकर पूरा निर्णय मुस्लिम मजहबी गुरुओं पर छोड़ता हूँ और वे जो उचित निर्णय देंगे मैं उसी को अंतिम निर्णय मानता हूँ।
इसी प्रकार जब सूर्यनमस्कार मे सजदे जैसी स्थितियाँ आती हैं तो क्या बिना तकवा के उसे सजदा माना जाएगा। जब मुस्लिम के दिल मे सूर्य के लिए आस्था है ही नहीं तो क्या वह सजदा माना जा सकता है? इस पर अंतिम निर्णय और विचार पूरी तरह मुस्लिम मजहबी गुरुओं के हाथ में है।

(उपरोक्त दी हुई कुरआन की सभी आयतें पवित्र कुरआन (सुगम हिन्दी अनुवाद), प्रकाशक-मधुर संदेश संगम, अबुल फज़ल एंकलेव, जामिया नगर, दिल्ली से ली गयी हैं।)

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